अंतत: दोनों भाइयों ने बस में पांच सीटें बुक कराई! सबसे पीछे की । दो अपने लिए और तीन मां ·के लिए। मां बहुत बीमार थी। वह लेट कर ही वापस गांव जा सकती थी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था और साथ ही यह भी कहा कि घर पर ही जितनी सेवा हो सकती है, करो।
बड़ा भाई दिल्ली में ही काम करता था। उसके पास जो कुछ जमा-पूंजी थी, मां के इलाज में खप गई। पैसे होते, तो वह मां को किसी टेक्सी में ले जाता।
दोनों बेटों के बीच मां आंखे मूंदे सो रही थी। बस ने आधे से अधिक फासला तय कर लिया था। तीन सीटों की टिकट लेने के कारण खड़े रहने को विवश किसी यात्री से तकरार भी नहीं हुई। कंडक्टर भी उनके ही इलाके का था। उसी ने सलाह दी थी कि इसी तरह बीमार मां गांव पहुंच सकती है, वरना रास्ते में सवारियां हील-हुज्जत करेगी।
अचानक मां की देह में जुंबिश हुई और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। पिछली सीट पर बैठे दोनो भाइयों ने एक दूसरे की ओर कातर निगाह से देखा। बड़े भाई ने अपने होठों पर उंगली रखकर छोटे को चुप रहने का इशारा किया। छोटे भाई की आंखों में आंसू तैरने लगे । उसका जी कर रहा था कि मां की मौत पर दहाड़ मार-मार कर रोए, पर परिस्थिति को समझ कर वह घुटा-घुटा आंसू बहाता रहा और थोड़ी देर में चुप हो गया।


